छत्तीसगढ़: अनोखी ता परंपराएं: 15 बैलगाड़ियों पर मंगल गीत गाते गाते पहुंची बरात, हर रस्म छत्तीसगढ़िया संस्कृति के नाम।

दूल्हा शम्भू नाथ सलाम ने कहा कि, बैलगाड़ी पर बारात की हमारी पुरानी परम्परा है। इसमें फिजूल खर्च नहीं होता है। परंपरा और संस्कृति को आगे बढ़ाना ही हमारा उद्देश्य है। इसलिए विवाह की हर रस्म को छत्तीसगढ़िया संस्कृति के नाम कर दिया।

शादियां भी अब हाईटेक और दिखावे से भरी हो गई हैं। हर कोई अपनी शादी को यादगार बनाने के लिए नए-नए तरीके ढूंढ रहा है। खासकर गांवों में तो लोग लग्जरी गाड़ी और हेलीकॉप्टर तक का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ के कांकेर में बैलगाड़ी पर सवार होकर बरात निकली। 18 बैलगाड़ियों से 100 बराती मंगल गीत गाते हुए निकले। करीब 15 किमी का सफर तीन घंटे में तय किया। इस दौरान दूल्हा भी पारंपरिक वेशभूषा पहने हुआ था। दूल्हे ने कहा कि, सिर्फ अपनी परंपरा निभाई है, जिससे वो जीवित रहें।

पारंपरिक वेशभूषा में दूल्हा भी बैठा बैलगाड़ी में
पिपली गांव के रहने वाले शंभू नाथ सलाम बड़गांव सर्कल के गोंडवाना समाज के अध्यक्ष हैं। उनकी शादी कराकपाल निवासी सविता के साथ तय हुई। तय तारीख पर गुरुवार को दोपहर करीब एक बजे उनकी बरात गांव से निकली और 15 किमी दूर करकापाल शाम करीब 4 बजे पहुंची। इस तीन घंटे का सफर दूल्हे और बरातियों बैलगाड़ी से तय किया। इस दौरान बैलगाड़ी में बैठे बराती मंगल गीत गाते रहे। बैलगाड़ियों को भी खूब सजाया गया था। वहीं दूल्हा चांदी के आभूषण और धोती-कमीज पहने पारंपरिक वेशभूषा में था।

बरात देख बुजुर्गों ने याद किए पुराने दिन
बरात जिस रास्ते से गुजरती लोग अपने घरों के खिड़की-दरवाजे खोलकर या फिर छतों पर खड़े होकर देखने लगते। रास्ते में लोगों ने बरात के साथ सेल्फी और फोटो तक लिए। नए जमाने में देसी अंदाज की बरात को देखकर बुजुर्गों को भी अपने पुराने दिन याद आ गए। प्राचीन परंपरा को देख कर वे बहुत खुश नजर आए। उनका कहना था कि तीन-चार दशक पहले तक तो ऐसा नजारा आम था। फिर कारों और अन्य वाहनों ने बरात में इसकी जगह ले ली। अब फिर इतने सालों बाद फिर से बैलगाड़ी में बरात देखकर बहुत अच्छा लगा।

खर्चीली शादियों के बीच सादगी आई पसंद
बरात जब दुल्हन के गांव पहुंची तो सिर्फ लड़की के परिवार ने ही नहीं, बल्कि पूरे गांव ने उनका स्वागत किया। दूल्हे और उसके परिवार के लोगों को खूब प्रशंसा की गई। खर्चीली शादियों के बीच ऐसी सादगी हर किसी को पसंद आ रही थी। बरात में शामिल हुए सियाराम पुड़ो, गजेंद्र उसेंडी, नरेश कुमेटी, बलि वड्डे समेत अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि, आने वाली पीढ़ी को सामाजिक दिशा की ओर रुख करने का बेहतर तरीका है। उन्हें गर्व है कि आज की युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित रख रही है

दूल्हा बोला- परंपरा और संस्कृति को आगे बढ़ाना ही उद्देश्य
दूल्हा शम्भू नाथ सलाम ने कहा कि, बैलगाड़ी पर बारात की हमारी पुरानी परम्परा है। इसमें फिजूल खर्च नहीं होता है। परंपरा और संस्कृति को आगे बढ़ाना ही हमारा उद्देश्य है। इसलिए विवाह की हर रस्म को छत्तीसगढ़िया संस्कृति के नाम कर दिया। शम्भू नाथ ने बताया कि आधुनिकता के इस युग मे प्राचीन और छत्तीसगढ़ी हमारी परम्परा विलुप्त होती जा रही है, जिसे संजो कर और संरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है। आने वाले पीढ़ी के लोग भी अपनी परम्पराओ और रीति रिवाजों के अनुसरण करें।