भिलाई में गरीबों के हक का चावल की खुलेआम तस्करी: गरीबों का राशन हड़प रहे हैं मुनाफाखोर,भिलाई में लंबे समय से चल रही हैं चावल की तस्करी,बड़ी तस्करी का पर्दाफाश

छत्तीसगढ़ सरकार गरीबों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबों को राशन दे रही है, जिससे कोई भी गरीब भूखा न रहे। इधर मुनाफा के लालच में गरीबों के हक के चावल की तस्करी की जा रही है।


खाद्य विभाग की भूमिका पर संदेह

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बेधड़क उचित मूल्य की दुकान से मिलने वाले चावल की तस्करी की जा रही है। खाद्य विभाग कार्रवाई करना तो दूर बिना जांचे ही पीडीएस के चावल को पहचानने से इनकार कर देता हैं। पुलिस पीडीएस चावल संदेह कर पकड़ती है। खाद्या विभाग लीपापोती कर कह देता है पीडीएस के समतुल्य नहीं है।

सुपेला,केम्प,खुर्सीपार क्षेत्र में पीडीएस चावल की तस्करी धरल्ले से की जा रही है, सूत्रों से जानकारी मिली है कि सुपेला के कुछ राशन दुकानदार धरल्ले से पीडीएस का चावल खरीदते हैं फिर चावल तस्कर चावल को ऑटो और पिकअप के जरिए जेवरा सिरसा की राइस मिलों में बेच रहे हैं।


भिलाई में पीडीएस चावल की हेरा फेरी का मामला लगातार सामने आ रहा है। खुर्सीपार के वार्ड 49 में काली मंदिर के पास बीएसपी क्वार्टर के आंगन में रखी 43 बोरी चावल फूड डिपार्टमेंट में जप्त किया। यह चावल अमित मांझी ने यहां रखे थे।

मकान मालिक ने कहा कि 2 दिन पहले उसने आंगन में चावल रखने के लिए जगह किराए पर ली थी।  फूड इंस्पेक्टर ने जब अमित मांझी से इस बारे में पूछा तो उसने बताया कि यह चावल अपनी बहन की शादी के लिए जमा किया था। और राशन कार्ड धारी से उसने यह चावल खरीदा था। लेकिन शादी के लिए 21 कुंतल चावल के बात किसी को हजम नहीं हुई। हालांकि अलग-अलग लोगों से चावल खरीदने का कोई सबूत नहीं दे पाया ।

इधर असिस्टेंट फूड कंट्रोलर और फूड इंस्पेक्टर ने मिलकर चावल की जप्ती बनाई और सैंपल जांच के लिए भेज दिया है। शिकायतकर्ता व पूर्व पार्षद जोगेंद्र शर्मा ने बताया कि उन्हें मोहल्ले वालों ने यहां चावल रखने की बात बताई थी। जिसके बाद उसने पुलिस और फूड कंट्रोलर को इसकी सूचना दी , इसके बाद आज यह पूरी कार्रवाई हुई।

इस पूरे मामले में फूड कंट्रोलर दीपंकर ने बताया कि चावल पीडीएस के हैं या कहीं और से खरीदे हुए। इसकी रिपोर्ट आने के बाद ही सारे खुलासे हो पाएंगे।

ऐसे चलता है पूरा खेल

असल में राशन दुकान से मिलने वाला चावल मोटा होता है। सच्चाई यह है कि अधिकांश कार्डधारी राशन दुकान से चावल लेने के बाद 21-22 रुपए में बेच देते हैं। चावल को राशन दुकान वाले भी खरीद लेते हैं। राशन दुकान से छुड़ा कर बेचा गया चावल राइस मिलों में जाता है। वहीं एक बार फिर मिलिंग कर बाजार में अधिक दाम में बेचा जाता है। अलग मिलिंग नहीं भी हुई तो उसी चावल को मिलर कस्टम मिलिंग के बदले नान को देता है। उसी चावल को नान के अधिकारी फिर राशन दुकानों में पहुंचा देते हैं। इस तरह रिसाइकिलिंग चलते रहता है। बेहतर होता कि सरकार चावल की क्वालिटी सुधार कर राशन कार्डधारियों को दे तो कालाबाजारी काफी हद तक रुकेगा। क्वालिटी ठीक होने से लोग चावल को खाएंगे।