झीरम घाटी हमले की 12वीं बरसी आज…,माओवादी मिट रहे,झीरम के घाव अभी भी हरे,देश के सबसे बड़े राजनीतिक 33लोगो की निर्मम हत्याकांड को नक्सलियों ने दिया था अंजाम,कब मिलेगा न्याय,बताया कौन था मास्टरमाइंड

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में माओवादियों का सफाया जारी है लेकिन झीरम घाटी हमले के 12 साल बाद भी पीड़ितों के स्वजन के घाव अभी भी हरे हैं। 25 मई 2013 के नृशंस हमले में कांग्रेस के शीर्ष नेता मारे गए थे जिसकी जांच अब भी अधूरी है। पीड़ितों के स्वजन न्याय और पूरी सच्चाई जानने का इंतजार कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में माओवादियों का सफाया जारी है, लेकिन झीरम घाटी हमले के 12 साल बाद भी पीड़ितों के स्वजन के घाव अभी भी हरे हैं। 25 मई, 2013 के नृशंस हमले में कांग्रेस के शीर्ष नेता मारे गए थे, जिसकी जांच अब भी अधूरी है। पीड़ितों के स्वजन न्याय और पूरी सच्चाई जानने का इंतजार कर रहे हैं।
माओवादियों ने मारे थे शीर्ष कांग्रेसी नेता सहित 27 लोग
मालूम हो कि हाल में मास्टरमाइंड बसव राजू सहित कई बड़े इनामी माओवादी ढेर हुए हैं। सुकमा जिले के झीरम घाटी में माओवादियों ने वर्ष 2013 में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला कर बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा, तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सहित 27 लोगों की हत्या कर दी थी।

भूपेश सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री रहे उमेश पटेल ने हमले में पिता व बड़े भाई को खो दिया था। उमेश कहते हैं कि जब भी झीरम कांड की बरसी आती हैं, उनके घाव फिर से हरे हो जाते हैं। बार-बार इस बात को कुरेदना सही नहीं मानते।

कुछ देर की चुप्पी के बाद वे फिर से कहते हैं, घटना ने उनका पूरा जीवन बदल दिया। वह कभी राजनीति में नहीं आना चाहते थे, पर पिता और भाई की राजनीतिक विरासत संभालना उनकी मजबूरी बनी गई।
महेंद्र कर्मा के प्रति सबसे अधिक क्रूरता दिखाई
मानते हैं कि भले ही घटना की जांच रिपोर्ट आने में अब बहुत देर हो चुकी है, पर उम्मीद है कि एक दिन झीरम का सच जरूर सामने आएगा। झीरम की घटना में माओवादियों ने बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा के प्रति सबसे अधिक क्रूरता दिखाई थी। उन्हें बस्तर टाइगर क्यों कहा जाता है, घटना ने सिद्ध कर दिया था।

माओवादी कर्मा से बहुत नाराज थे

दरअसल महेंद्र कर्मा ने माओवादियों के विरुद्ध वर्ष 2005 में सलवा जुडूम आंदोलन की अगुआई की थी। यही कारण था कि माओवादी कर्मा से बहुत नाराज थे। वहां पहुंचे माओवादी बार-बार पूछ रहे थे, कर्मा कौन है? तब महेंद्र कर्मा गाड़ी से उतरे और माओवादियों से कहा कि- ”मैं कर्मा हूं, सभी को जाने दो, जो करना है मेरे साथ करो”।
12 वर्ष बाद अब निष्पक्ष जांच की संभावना
इसके बाद माओवादियों ने उन्हें जंगल में ले जाकर सौ से अधिक गोलियां मारी थीं। उनके शव पर कूदकर अपनी बर्बरता का जश्न मनाया। उनके बेटे छविंद्र कर्मा घटनाक्रम के पीछे राजनीतिक षड्यंत्र बताते हैं।

कहते है कि कर्मा जी उस समय सीएम के दावेदार थे, यह बात भी कई लोगों को खटक रही थी। 12 वर्ष बाद अब निष्पक्ष जांच की संभावना नहीं देख पा रहे हैं।

Jhiram Ghati Attack: राजनीतिक हत्याकांड की प्लानिंग
केंद्र सरकार नक्सलियों के खात्मे की डेड लाइन तय कर चुकी है। रविवार को झीरम कांड की 12वीं बरसी है और जब अगले साल 13वीं बरसी आएगी तब तक सशस्त्र नक्सलवाद का खात्मा हो चुका है। (Jhiram Ghati Attack) यह एक दावा है लेकिन इस दावे को बल इसलिए मिल रहा है क्योंकि छत्तीसगढ़ समेत तेलंगाना, महाराष्ट्र और ओडिशा में नक्सलियों के खात्मे का काम तेजी से चल रहा है। झीरम घाटी कांड के मुख्य साजिशकर्ता बसव राजू को अबूझमाड़ के जंगलों में चार दिन पहले ही ढेर किया गया।

बसव राजू वही था जिसने इस सबसे बड़े राजनीतिक हत्याकांड की प्लानिंग की थी। बसव राजू उस वक्त नक्सलियों की सैन्य इकाई का प्रमुख था। उसके नेतृत्व में ही नक्सलियों ने बस्तर जिले की झीरम घाटी को घेरा था और कांग्रेस की टॉप लीडरशीप समेत 30 से ज्यादा लोगों को बेहरहमी से मार डाला था। पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, वरिष्ठ कांग्रेसी महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल, उदय मुदलियार जैसे बड़े नेता इस हमले में मारे गए थे।

25 मई 2013 को झीरम घाटी में यह हुआ था
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2013 के पहले कांग्रेस ने अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए परिवर्तन यात्रा की शुरुआत की थी। उस दौरान राज्य में भाजपा सरकार थी। इस परिवर्तन यात्रा के जरिए कांग्रेस सत्ता पर काबिज होना चाह रही थी। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा सुकमा से जगदलपुर लौट रही थी। इसी बीच 25 मई 2013 को एक ऐसी नक्सली घटना हुई जिसने न सिर्फ छत्तीसगढ़ को बल्कि पूरे देश को हिला कर रख दिया।
इस घटना में नक्सलियों ने एक साथ छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रथम पंक्ति के कई नेताओं को मौत के घाट उतार दिया। मरने वालों में तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, विद्या चरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा, उदय मुदलियार सहित लगभग 30 से ज्यादा नेता, कार्यकर्ता और कई जवान शामिल थे। (Jheeram Valley attack) इतना बड़ा राजनीतिक नरसंहार देश में इससे पहले नहीं हुआ।

जांच नहीं अब प्रहार से न्याय देने का काम चल रहा
झीरम घाटी कांड की जांच से भले ही कुछ खास नहीं हुआ पर अब पिछले डेढ़ साल से छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ जो चल रहा है उससे पीडि़त परिवार बेहद खुश हैं। झीरम घाटी को जिन लोगों ने सबसे करीब से देखा वह भी केंद्र और राज्य सरकार की कार्रवाई की सराहना कर रहे हैं। उनका कहना है न्याय तो आखिर न्याय होता है अब वह चाहे जैसे मिले। इस कांड में शामिल रहे कई नक्सली अब तक मारे जा चुके हैं। जो बचे हैं उन्हें मार्च 2026 तक खत्म करने का दावा सरकार लगातार कर रही है।

एनआईए ने क्लोजर में कहा था दहशत फैलाने की गईं हत्याएं
Jhiram Ghati Attack: साल 2013 में हुए झीरम नक्सली हमले की जांच की जिम्मेदारी केंद्र सरकार ने घटना के दो बाद ही 27 मई 2013 को एनआईए को सौंप दी। एनआईए ने इस मामले की पहली चार्ज सीट 24 सितंबर 2014 को विशेष अदालत में दाखिल की। इस मामले में 9 गिरफ्तार नक्सली सहित कुल 39 लोगों को आरोपी बनाया गया। इसके बाद 28 सितंबर 2015 को सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की गई, जिसमें 88 और आरोपियों के नामों को शामिल किया गया।

इस मामले में जैसे ही चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की गई, अधूरी जांच, राजनीतिक दबाव, नक्सली लीडर्स को बचाने जैसे आरोप लगने शुरू हो गए। इसके बाद एनआईए की क्लोजर रिपोर्ट आई जिसमें कहा गया कि नक्सलियों ने दशहत फैलाने के लिए कांड को अंजाम दिया था। एनआईए को कोई अन्य एंगल इसमें नहीं मिला। इसके बाद 2018 में जब कांग्रेस की सरकार आई तो तो भूपेश बघेल ने जांच के लिए एसआईटी गठित की। एसआईटी की जांच चल ही रही थी कि इस पर हाईकोर्ट ने स्टे दे दिया।

झीरम घाटी में आठ सौ नक्सलियों थी मौजूदगी
छत्तीसगढ़ के झीरम घाटी में एक दशक पूर्व हुए नक्सली हमले की असल कहानी सरकार की ख़ुफ़िया तंत्र की पोल खोल रही हैं. नक्सली हमले में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की हत्या को लेकर सेन्ट्रल रीजनल कमांड के पूर्व नक्सली कमांडर प्रकाश ने बताया कि घटना को अंजाम देने के लिए सीआरसी- 2 के करीब 300 हार्डकोर नक्सली आधुनिक हथियारों से लैस होकर पहुंचे थे. 300 नक्सलियों की मदद के लिए दरभा,दंतेवाड़ा,सुकमा और बीजापुर से आएं जन मिलिशिया कमेटी के करीब 500 नक्सलियों को लगाया गया था. इसमें नक्सलियों के ब्रेकअप पार्टी और मेडिकल टीम के सदस्य भी शामिल रहे हैं. झीरम घाटी में आठ सौ नक्सलियों की मौजूदगी की खबर खुफिया तंत्र को ना लग पाना सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है.

हिकुम में 30 दिनों तक चली प्रैक्टिस
झीरम कांड को अंजाम देने के लिए हिकुम गांव में नक्सलियों के द्वारा एक महीने तक अभ्यास किया गया था. दरभा घाटी की भौगोलिक परिदृश्य को हिकुम के जंगल में तैयार की गई थी. गांव के समीप जंगल में अस्थाई रूप से दरभा घाटी तैयार कर जवानों को टारगेट करने के लिए 30 दिनों तक रोजाना सुबह-शाम प्रैक्टिस चलती रही. इस दौरान बड़ी संख्या में मौजूद नक्सलियों के लिए खाने-पीने का पूरा इंतजाम आसपास के गांव वालों के द्वारा किया गया था. इससे पहले जवानों की रेकी कर नक्सलियों के द्वारा झीरम घाटी में तैनात रहने वाले जवानों की लोकेशन की पुख्ता जानकारी इकट्ठा कर ली गई थी. घाटी में सुरक्षा व्यवस्था के तहत जवान कहां-कहां खड़े होते हैं और उनकी संख्या कितनी होती है. इस हिसाब से नक्सलियों के द्वारा मास्टर प्लान तैयार कर वारदात को अंजाम की रूपरेखा तैयार की गई थी।

खूनी खेल के बाद फिर पहुंचे थे हिकुम
देश का सबसे बड़ा राजनीतिक नरसंहार होने के बाद नक्सलियों का जमावड़ा फिर हिकुम गांव पहुंचा था. यहां दो दिनों तक रुकने के बाद सुकमा के जंगल में समीक्षा बैठक भी हुई थी. इस दौरान राजनीतिक हत्या को लेकर नक्सलियों के बीच में नफे और नुकसान को लेकर कयास लगाए गए थे.समीक्षा बैठक में सेंट्रल कमेटी के शीर्ष नक्सली लीडरों की मौजूदगी में जश्न भी मनाया गया था. जिसके बाद नक्सली अपने-अपने इलाके की ओर लौट गए. झीरम कांड के बाद नक्सली संगठन में करीब एक साल काम करने के बाद नक्सली कमांडर प्रकाश संगठन को छोड़कर घर आ गया था. जिसके बाद नारायणपुर में डीआरजी के निरीक्षक सुक्कू नुरेटी के संपर्क में आया और बस्तर आईजी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।