अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघ की संदिग्ध मौत, वन विभाग की कार्यप्रणाली कठघरे में
बिलासपुर।
अचानकमार टाइगर रिजर्व में एक बाघ की संदिग्ध मौत ने वन विभाग की निगरानी व्यवस्था और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वन विभाग द्वारा जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति में बाघ की मौत का कारण दो बाघों के बीच आपसी संघर्ष बताया गया है, लेकिन जमीनी हालात और स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी इस दावे से मेल नहीं खाती।

सूत्रों के अनुसार जंगल में मिला बाघ का शव कम से कम 5 से 6 दिन पुराना था। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि टाइगर रिजर्व में नियमित और प्रभावी पेट्रोलिंग की जा रही थी, तो बाघ की मौत का पता इतने दिनों तक क्यों नहीं चला? क्या रिजर्व की गश्त व्यवस्था पूरी तरह फेल हो चुकी है या फिर जानबूझकर इस गंभीर घटना को दबाने का प्रयास किया गया?


अचानकमार जैसे अति संवेदनशील टाइगर रिजर्व में एक संरक्षित वन्यजीव का शव कई दिनों तक जंगल में पड़ा रहना, विभागीय निगरानी प्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है। यह घटना न केवल वन विभाग के दावों की पोल खोलती है, बल्कि टाइगर सुरक्षा को लेकर किए जा रहे दावों को भी खोखला साबित करती है।



मीडिया से दूरी, सवालों से परहेज
स्थानीय पत्रकारों का आरोप है कि अचानकमार टाइगर रिजर्व प्रबंधन लगातार मीडिया से दूरी बनाए रखता है। अधिकांश घटनाओं में समय पर जानकारी साझा नहीं की जाती और जब मामला सार्वजनिक हो जाता है, तब औपचारिकता निभाने के लिए एक तैयारशुदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी जाती है। बाघ की मौत की खबर सामने आने के अगले ही दिन विभाग ने लंबी प्रेस विज्ञप्ति जारी तो की, लेकिन पेट्रोलिंग, निगरानी और देरी जैसे अहम सवालों पर चुप्पी साध ली गई।
इस पूरे मामले ने वन विभाग की जवाबदेही, पारदर्शिता और टाइगर रिजर्व में सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर संदेह पैदा कर दिया है। अब आवश्यकता है कि इस मौत की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके और भविष्य में ऐसी लापरवाही दोहराई न जाए।











































