जिला दुर्ग एवं आसपास के क्षेत्रों के अभिभावकों, समाजसेवियों और जागरूक नागरिकों ने निजी स्कूलों में बढ़ती अनियमितताओं, मनमानी फीस, कमीशनखोरी और शिक्षा के व्यापारीकरण के विरोध में आज एकजुट होकर माननीय मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ सरकार को विस्तृत ज्ञापन सौंपा।

अभिभावकों ने कहा कि जिले के कई निजी विद्यालय शिक्षा को पवित्र सेवा न मानकर “लाभ का व्यवसाय” बना चुके हैं। इससे आम परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है और बच्चों के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

अभिभावकों द्वारा उठाए गए मुख्य मुद्दे


- महंगी किताबों की अनिवार्यता
निजी स्कूल NCERT की जगह अत्यधिक महंगी प्राइवेट प्रकाशन की किताबें थोप रहे हैं।
एक ही दुकान से खरीदने का दबाव भी डाला जाता है, जो स्पष्ट रूप से कमीशन आधारित व्यवस्था का संकेत है।

- यूनिफॉर्म और स्टेशनरी का संगठित व्यापार
हर 2–3 वर्ष में यूनिफॉर्म डिज़ाइन बदला जाता है।
विशेष दुकानों से बैग, जूते, बेल्ट, टाई आदि खरीदने को मजबूर किया जाता है।


- हर वर्ष पाठ्यपुस्तकें बदलना
पाठ्यपुस्तकों में लगातार बदलाव से अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।
- विभिन्न नामों से मनमानी फीस वसूली
“मेंटेनेंस फीस”, “आईटी फीस”, “ऐक्टिविटी फीस”, “डेवलपमेंट फीस” के नाम पर बिना किसी आधार के शुल्क लिया जा रहा है।
- कमीशनखोरी का बड़ा खेल
कई स्कूल किताबों, कॉपियों, बैग और यूनिफॉर्म में प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष कमीशन लेते हैं।
- RTE नियमों का उल्लंघन
RTE बच्चों को मिलने वाली पुस्तकें, यूनिफॉर्म, जूते-मोज़े व स्टेशनरी कई स्कूल उपलब्ध नहीं कराते।
- शिकायत करने पर दबाव
अभिभावकों की शिकायतों को नजरअंदाज किया जाता है और कई मामलों में बच्चों पर भी दबाव बनाया जाता है।
- पारदर्शिता का अभाव
फीस की पूरी रसीद नहीं दी जाती और न ही स्कूल अपनी वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करते हैं।
- सुरक्षा व्यवस्था में लापरवाही
बस सुरक्षा, CCTV, फायर सेफ्टी के नाम पर पैसा लिया जाता है लेकिन सुविधाएँ मानक के अनुरूप नहीं होतीं।
मुख्यमंत्री से प्रमुख मांगें
अभिभावकों ने मुख्यमंत्री महोदय से निम्न कदम उठाने का आग्रह किया
राज्य में “निजी स्कूल फीस नियामक आयोग” (Fee Regulatory Authority) का गठन
गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान की तर्ज पर।
NCERT पुस्तकों को अनिवार्य किया जाए।
यूनिफॉर्म, जूते, स्टेशनरी की स्वतंत्र खरीद की अनुमति सुनिश्चित की जाए।
सभी निजी स्कूलों की वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
पुस्तकों में 3 वर्ष तक बदलाव प्रतिबंधित किया जाए।
फीस वृद्धि की सीमा प्रतिवर्ष अधिकतम 5% तय की जाए।
RTE नियमों का कड़ाई से पालन और उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर कार्रवाई।
जिला स्तरीय अभिभावक शिकायत निवारण समिति बनाई जाए।
निजी स्कूलों के लिए एक पारदर्शी सार्वजनिक ऑनलाइन पोर्टल बनाया जाए।
अभिभावकों की चेतावनी
यदि शीघ्र ही प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो अभिभावक संगठन जिला स्तर पर—
✔ शांतिपूर्ण आंदोलन
✔ जन जागरूकता अभियान
✔ शिक्षा विभाग के समक्ष धरना
✔ एवं कानूनी कार्रवाई
जैसे विकल्प अपनाने पर मजबूर होंगे।
प्रमुख वक्तव्य
अजय शिरबावीकर विधायक प्रतिनिधि ने कहा: “शिक्षा सेवा है, व्यापार नहीं। बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकार तत्काल हस्तक्षेप कर निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाए।”




































