कांग्रेस में गुटबाजी की जड़ गहरी: केंद्रीय पर्यवेक्षक की सूची दरकिनार, ब्लॉक अध्यक्षों की घोषणा के बाद कांग्रेस में अंदरूनी घमासान,गुटीय समीकरण हावी…

सबसे बड़ा सवाल यह है कि केंद्रीय पर्यवेक्षक द्वारा तैयार की गई प्राथमिक सूची आखिर किस दबाव में किनारे कर दी गई। पार्टी सूत्रों के अनुसार पर्यवेक्षक ने संगठनात्मक अनुभव, सक्रियता और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए जिन कार्यकर्ताओं के नाम सुझाए थे, उनमें से अधिकांश को अंतिम सूची में जगह नहीं मिली। इससे पर्यवेक्षक की भूमिका और उसकी उपयोगिता पर भी सवाल उठने लगे हैं।

इसके उलट, कई ऐसे चेहरे ब्लॉक अध्यक्ष बना दिए गए हैं, जिनका नाम न तो संगठन की आंतरिक चर्चाओं में था और न ही वे सक्रिय दावेदार माने जा रहे थे। कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा आम है कि यह चयन संगठनात्मक जरूरत से ज्यादा स्थानीय प्रभाव, सिफारिशों और बदले हुए जिला समीकरणों का नतीजा है।

संगठन के अंदरखाने यह सवाल अब खुलकर उठ रहा है कि यदि केंद्रीय पर्यवेक्षक की रिपोर्ट को ही नजरअंदाज करना था, तो उनकी नियुक्ति का औचित्य क्या था। पार्टी के कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह पूरी प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह गई, जबकि असली फैसला पहले ही कहीं और तय हो चुका था।

हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन चुप्पी ने संदेह को और गहरा कर दिया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि पारदर्शिता के अभाव में लिया गया ऐसा फैसला संगठन में असंतोष को जन्म दे सकता है।

एकता पर खतरा, जमीनी पकड़ पर असर की आशंका

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठन में बदलाव जरूरी है, लेकिन जब अनुभव और समर्पण को दरकिनार किया जाता है, तो उसका सीधा असर जमीनी कार्यकर्ताओं की ऊर्जा पर पड़ता है। यदि समय रहते नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को भरोसे में नहीं लिया गया, तो इसका असर बूथ स्तर की मजबूती और आने वाले चुनावी समीकरणों पर साफ दिख सकता है।

फिलहाल कांग्रेस के भीतर बैठकों, फोन कॉल्स और बंद कमरे की रणनीतियों का दौर जारी है। कई वरिष्ठ नेता डैमेज कंट्रोल में जुटे हुए हैं ताकि असंतोष खुली बगावत में न बदल जाए।

नए ब्लॉक अध्यक्षों को लेकर पार्टी के एक वर्ग में उम्मीद जरूर है। समर्थकों का कहना है कि लंबे समय से जमी नेतृत्व शैली को तोड़ने के लिए नए चेहरों को मौका देना जरूरी था। पार्टी नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अब फोकस संगठनात्मक प्रशिक्षण, बूथ मैनेजमेंट और सक्रिय जनसंपर्क पर रहेगा।

लेकिन दूसरी ओर वर्षों से पार्टी का झंडा उठाए चल रहे कई पुराने कार्यकर्ता खुद को हाशिये पर धकेला हुआ महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि संघर्ष के समय उन्हें आगे रखा गया और निर्णय के समय बाहर कर दिया गया। यही असमंजस अब संगठन की सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि ब्लॉक अध्यक्षों की यह नई टीम संगठन को मजबूती दे पाती है या फिर यह फैसला कांग्रेस के भीतर एक और अंदरूनी टकराव की कहानी बनकर रह जाता है।