भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) प्रबंधन द्वारा लीज प्रक्रिया में अपनाई गई नीतियों को लेकर भिलाई टाउनशिप के लगभग 1600 परिवारों में गहरा असंतोष व्याप्त है। आवंटन धारकों का आरोप है कि भूमि का बाजार मूल्य पहले ही वसूलने के बावजूद, लीज नवीनीकरण के नाम पर पुनः बाजार मूल्य के आधार पर भारी ग्राउंड रेंट एवं सर्विस चार्ज वसूली का प्रयास किया जा रहा है, जो न केवल अन्यायपूर्ण बल्कि संविधान सम्मत भी नहीं है।
आवंटन धारकों का कहना है कि भूमि आवंटन के समय स्पष्ट रूप से 30 या 33 वर्षों के लिए लीज नवीनीकरण हेतु केवल ग्राउंड रेंट एवं सर्विस चार्ज लेने का उल्लेख दस्तावेजों में किया गया था। इसके बावजूद अब एकतरफा निर्णय लेकर पूर्व से आवंटित भूखंडों पर नई शर्तें थोपना अनुचित है।

विशेष रूप से भारतीय इस्पात प्राधिकरण (SAIL) की 340वीं बैठक (21 जुलाई 2008) एवं 340वीं (बी) बैठक (25 जुलाई 2008) में पारित निर्णयों को वर्ष 1960 से 2006 के मध्य आवंटित भूखंडों पर बिना आवंटन धारकों को विश्वास में लिए लागू किया गया। जबकि यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि 2008 के बाद लिए गए नीतिगत निर्णय 2008 के बाद हुए आवंटनों पर ही लागू होने चाहिए।


इस प्रकरण में उच्च न्यायालय, बिलासपुर की एकल पीठ द्वारा समान विषय पर अलग-अलग एवं विरोधाभासी निर्णय दिए जाने से भी आवंटन धारक स्तब्ध हैं। कई मामलों में समय पर दिए गए आवेदनों को नजरअंदाज किया गया, वहीं कुछ प्रकरणों में यह टिप्पणी की गई कि “आवंटी वर्षों तक सोते रहे”, जबकि वास्तविकता यह है कि अनेक फाइलें स्वयं भिलाई इस्पात प्रबंधन द्वारा वर्षों तक लंबित रखी गईं।


एकल पीठ के एक आदेश में यह कहना कि यदि कोई स्वामित्वधारी 600 वर्गफुट भूमि पर ₹2000 प्रतिमाह किराया मांगता है तो प्रबंधन गलत नहीं है—अपने आप में हास्यास्पद और याचिकाकर्ताओं द्वारा चुनौती दी गई SAIL की नीति के मूल प्रश्न को अनुत्तरित छोड़ देता है।

आवंटन धारकों का यह भी आरोप है कि बीते 15 वर्षों से इस पूरे प्रकरण को जानबूझकर उलझाया गया, समय पर आवेदन करने वालों को भी राहत नहीं दी गई और संस्था-संगठनों द्वारा भेजे गए पत्रों को 2008 की बैठक का हवाला देकर अनदेखा किया गया।
इन सभी तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए अब यह मामला माननीय उच्च न्यायालय की डबल बेंच में पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है। सभी आवंटन धारक अपने विद्वान अधिवक्ताओं के माध्यम से प्रमाणिक दस्तावेजों एवं न्यायसंगत तर्कों के साथ पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं।
भिलाई स्टील सिटी चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष श्री ज्ञानचंद जैन ने शहर के व्यापारियों के नाम जारी अपील में स्पष्ट किया है कि डबल बेंच से सकारात्मक और न्यायोचित निर्णय की उम्मीद है, किंतु यदि सम्मानजनक समाधान नहीं मिला तो यह लड़ाई सर्वोच्च न्यायालय तक जारी रहेगी।
उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि शहर के किसी भी व्यापारी या सामाजिक संस्था को घबराने की आवश्यकता नहीं है। आवंटन धारक न्यायसंगत राशि देने के पक्षधर हैं और भिलाई इस्पात प्रबंधन से अपेक्षा करते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय तक किसी भी आवंटन धारक को किसी भी प्रकार से परेशान नहीं किया जाएगा।
न्यायालय के प्रति सभी की आस्था अटूट है, किंतु न्यायिक विसंगतियों की ओर ध्यान आकृष्ट कराना भी नागरिकों का संवैधानिक अधिकार और जिम्मेदारी है।











































