कोई समय के खेल को नहीं समझ पाया है. भारत और रूस के बीच का रिश्ता इसका बड़ा सबूत है. एक वक्त था जब रूस में भगवत गीता को बैन करने की बात हुई थी. मामला अदालत पहुंच गया था. मगर अदालत ने भगवत गीता पर बैन करने की मांग खारिज कर दी थी. आज उसी भगवत गीता की प्रति पीएम मोदी ने पुतिन को गिफ्ट में दिया।

कहते हैं वक्त बहुत बलवान होता है. वक्त का पहिया एक न एक दिन जरूर घूमता है. भारत और रूस के संबंध में भी कुछ इसी तरह वक्त का पहिया घूमा है. भारत-रूस के संबधों ने फिर साबित किया कि समय की गति बहुत विचित्र होती है. यही कारण है कि रूस कभी भगवत गीता को बैन करने वाला था, मगर आज वही हिंदुओं की पवित्र ग्रंथ गीता पुतिन के हाथों में सुशोभित हो रही है. व्लादिमीर पुतिन अभी भारत दौरे पर हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने बुधवार को रूसी राष्ट्रपति पुतिन का अपने आधिकारिक आवास, 7 लोक कल्याण मार्ग पर स्वागत किया. यहां पीएम मोदी ने पुतिन को भागवत गीता भेंट की. इससे 2011 की वो पुरानी याद ताजा हो गई, जब रूस की अदालत में गीता को बैन करने का मामला गया था।

जी हां, यह मामला 15 साल पुराना है. साल 2011 में रूसी प्रांत साइबेरिया में टॉम्स्क की अदालत में गीता का मामला पहुंचा था. उस वक्त भगवत गीता (भगवद्गीता) को बैन करने की मांग की गई थी. हालांकि, यह भगवत गीता की रूसी भाषा में अनुवादित प्रति थी. अदालत में भगवत गीता को ‘उग्रवादी साहित्य’ करार देकर बैन करने की मांग की गई थी. रूसी विदेश मंत्रालय भी मामले की जांच में जुटा था. उस वक्त इस मामले की वजह से भारत से लेकर रूस तक में आक्रोश दिखा था. मगर देखिए वक्त ने कैसे करवट बदली. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुतिन को इसी ग्रंथ यानी गीता की रूसी भाषा में अनुवादित प्रति उपहार स्वरूप दी. अव्वल तो यह कि पुतिन ने भी इसे बड़े आदर से स्वीकार किया।


गीता पर 2011 में क्या हुआ था?


2011 में रूस की फेडरल सिक्योरिटी सर्विस ने रूसी भाषा वाली भगवत गीता को एक्स्ट्रीमिस्ट माना था. साइबेरियाई शहर टॉम्स्क में प्रॉसिक्यूटर चाहते थे कि गीता के इस एडिशन को ‘एक्सट्रीमिस्ट’ घोषित किया जाए. अगर ऐसा होता तो भागवत गीता तानाशाह हिटलर की ‘मेन कैम्फ’ जैसी कैटेगरी में आ जाती. इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस (इस्कॉन) से प्रकाशित ‘भगवद्गीता ऐज इट इज’ पर अदालती कार्यवाही हुई. रूसी अभियोजकों का दावा था कि इस ग्रंथ में इसे न मानने वालों के प्रति अपमानजनक टिप्पणियां हैं, जो सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा दे सकती हैं. मामला टॉम्स्क की अदालत में पहुंचा, जहां सुनवाई के दौरान रूस में रहने वाले हिंदू समुदाय और भारत सरकार ने कड़ा विरोध जताया।

भारत में भी हंगामा और आखिरकार जीत
इतना ही नहीं, भारत में संसद तक में इस मुद्दे पर हंगामा हुआ. उस वक्त के विदेश मंत्री रहे एसएम कृष्णा ने भी रूसी राजदूत से बात की थी. भारत में कई जगहों पर प्रदर्शन हुए थे. वैश्विक स्तर पर हिंदू संगठनों ने आवाज उठाई. आखिरकार, 28 दिसंबर 2011 को गीता की जीत हुई. रूसी अदालत ने गीता के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी. अदालत ने माना कि हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ में कोई एक्सट्रीमिस्ट कंटेंट नहीं है. हालांकि, उस वक्त खुद रूस के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि भागवत गीता के टेक्स्ट पर कमेंट्री की जांच हो रही है, न कि खुद टेक्स्ट की।
15 साल में कैसे बदला खेल?
इस मामले का ट्रायल जून 2011 में शुरू हुआ था. भागवत गीता के रूसी अनुवाद को फेडरल लिस्ट ऑफ एक्सट्रीमिस्ट मटीरियल्स में डाले जाने का खतरा था. मगर अदालत के फैसले से यह संभव नहीं हो पाया. अदालत ने गीता को लीगल माना. समय बीता और अब 2025 में परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है. तभी तो रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें भगवद्गीता की रूसी अनुवादित प्रति भेंट की।
रूस और भारत के बीच की गीता वाली गाथा
2011 का विवाद: रूस में भगवद्गीता की ‘ऐज इट इज’ प्रति को एक्सट्रीमिस्ट मानकर बैन की मांग, लेकिन कोर्ट ने खारिज किया.
भारत का विरोध: भारत की संसद में हंगामा हुआ था. देशभर में प्रदर्शन हुए थेऔर कूटनीतिक दबाव भी डाला गया था.
हिटलर की किताब वाली कैटेगरी: अगर अदालत का फैसला गीता के खिलाफ आता तो यह हिटलर की किताब मेन कैंफ की तरह बैन वाली लिस्ट में चली जाती.
2025 में पुतिन को गिफ्ट: 15 साल बाद उसी गीता की प्रति पीएम मोदी ने पुतिन को गिफ्ट की. यह भारत और रूस के बीच सांस्कृतिक कूटनीति का प्रतीक है।
महत्व: इस घटनाक्रम से यह साबित होता है कि भारत-रूस संबंध मजबूत समय के साथ ऐसे विवाद आते-जाते रहते हैं और दोनों देश आसानी से सुलझा लेते हैं।
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