छत्तीसगढ़ राजभवन अब ‘लोकभवन’ के नाम से जाना जाएगा। गृह मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जारी पत्र के अनुसार राज्यपाल के सचिव डॉ. सीआर प्रसन्ना ने राजभवन का नाम परिवर्तित कर लोकभवन करने का आदेश आज जारी कर दिया है।

छत्तीसगढ़ राजभवन अब ‘लोकभवन’ के नाम से जाना जाएगा। गृह मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जारी पत्र के अनुसार राज्यपाल के सचिव डॉ. सीआर प्रसन्ना ने राजभवन का नाम परिवर्तित कर लोकभवन करने का आदेश आज जारी कर दिया है।

राज्यपाल के सचिव ने बताया कि राज्यपालों के सम्मेलन-2024 में राजभवनों का नाम बदलकर लोकभवन करने का सुझाव दिया गया था। इसी के अनुरूप गृह मंत्रालय द्वारा जारी पत्र के परिपालन में अब से सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए राजभवन का नाम लोकभवन के नाम से पढ़ा और लिखा जाएगा।


नाम के बदलावों पर आलोचना के सुर!
नाम के इन बदलावों पर आलोचना के सुर भी उठते हैं. कहा जाता है कि ‘नाम बदलने से क्या होगा’. असल में सच्चाई यह है कि ‘नाम में क्या रखा है’ यह तथ्य हर जगह नहीं चलता है. कई बार नाम ही उस पहचान का प्रतीक बन जाते हैं, जो जनभावना से जुड़वा महसूस कराते हैं और जनता को भी यह लगता है, यह जगह उसकी अपनी है.


जैसे कि राजपथ का ही उदाहरण लें. एक लोकतांत्रिक देश में किसी तरह के ‘राजपथ’ का अस्तित्व होना यह बताता है कि कहीं न कहीं शासन की परंपरा के भीतर ‘राजशाही’ की क्रूर मानसिकता जिंदा है. राजपथ, नाम शासकों के चलने का पथ बन जाता है, जबकि असल में यह वह सुलभ मार्ग होना चाहिए, जहां से आम जनता तक और आम जनता की शासन तक आसान पहुंच होनी चाहिए।

राजा रघु जो सम्राट होकर भी कुटिया में निवास करते थे
इस बारे में पौराणिक कथाओं से एक बड़ा और सटीक उदाहरण लिया जा सकता है. श्रीराम के वंश में उनके ही एक महान पूर्वज थे राजा रघु. राजा रघु की महानता के कारण ही सूर्यकुल का इक्ष्वाकु वंश रघुवंश कहलाया था. राजा रघु साकेत के बड़े भूभाग के महाराज थे, लेकिन उन्होंने जनता की सेवा के लिए कभी भी महल में निवास नहीं किया, बल्कि राज्य की सीमा के बाहर एक कुटिया में रहते थे, ताकि प्रजा उनसे कभी भी अलगाव न महसूस करे.
एक बार अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के कहने पर उन्होंने विश्वजित यज्ञ किया और यज्ञ के पारायण में अपनी सारी संपत्ति ब्राह्मणों, किसानों और श्रमण परंपरा के संतों को दान कर दीं. एक सुबह जब वह अपनी कुटिया में ध्यान कर रहे थे, तभी एक युवा वेदपाठी ब्राह्नण आया. उसका नाम कौत्स था. उसे अपने गुरु को दक्षिणा में स्वर्ण मुद्राएं देनी थीं जो उसके पास नहीं थीं।
राजा रघु, कौत्स और कुबेर की कथा
कौत्स ने राजा को कुटिया में अकेले देखा और जो ध्यान मग्न थे और वहीं पास में साधारण से चूल्हे पर भोजन पक रहा था. कौत्स संकोच में वहां से लौटने लगा, लेकिन फिर कुछ सोचकर राजा से अपनी बात की और फिर मौन हो गया. राजा रघु उसके मन की बात समझ गए और उसे कुबेर (यक्षपति और देवताओं के कोषाध्यक्ष) के पास भेज दिया. कुबेर ने राजा रघु के कहने धन की वर्षा कर दी और इस तरह कौत्स ने अपने गुरु को दक्षिणा दी।
कहने का मतलब ये है कि राजा, राजपरिवार और राज्य की शासन व्यवस्था इतनी सहज होनी चाहिए कि प्रजा उसमें शामिल होना महसूस करे न कि उससे अलग होकर खुद को हीन और सत्ताधीशों को विशेष मानने लगे. यही वजह है कि राज्य में अकाल पड़ने पर राजा जनक खुद हल चलाने निकलते हैं. राजा विक्रमादित्य वेश बदलकर प्रजा का हाल जानने निकलते हैं और इस परंपरा को हर्ष, चंद्रगुप्त समेत कई राजा अपनाते हैं. जो नहीं अपनाते वो मिट जाते हैं जैसे नंदवंश.
श्रीराम और महर्षि जाबालि की कहानी
श्रीराम जब वन को जाते हैं तो उनका रास्ता रोककर एक ऋषि जाबालि खड़े हो जाते हैं और पूछते हैं कि क्या सिर्फ पिता का वचन ही सत्ता की कसौटी है, प्रजा की भावना और लोकमत की कोई जगह नहीं? वह राम के वन जाने की आलोचना करते हैं और प्रजा के मत को बड़ा मानते हुए उनसे शासन संभालने के लिए कहते हैं।
राजा जनक जो नहीं लगाते थे राजसी दरबार
राजा जनक को ही लेकर यह प्रचलित है कि मिथिला में सैन्य बल और उसके अभ्यास की मनाही थी. इसीलिए सीरध्वज जनक के भाई कुशध्वज राज्य के दूसरे छोर पर सिर्फ सैन्य व्यवस्था को साथ लेकर रहते थे. राजा जनक कभी भी शिरस्त्राण (सिर पर पहने जाना वाला विशेष मुकुट जो कंधों को ढंकता था) नहीं पहनते थे. वह कवच नहीं लगाते थे, अंगरक्षकों को साथ नहीं रखते थे. उनका आसान योगी का आसन था और वह सभा में भी ऊंचाई पर नहीं बैठते थे. उनका दरबार आम जन के बीच खुले में लगता था और हमेशा ही ज्ञान और धर्मचर्चा वाले शास्त्रार्थ उनके दरबार में हुआ करते थे. रामायण और रामचरित मानस दोनों में ही उन्हें राजर्षि जनक कहा गया है और गृहस्थ आश्रम के ऋषि की संज्ञा भी दी गई है।
नाम बदलने का मतलब मानसिकता में बदलाव भी है- बीजेपी नेता
केंद्रीय सचिवालय में कई अलग-अलग भवन हैं। यहां पर मंत्रालयों को स्थानांतरित किया जा रहा है। इसको अब कर्तव्य भवन के नाम से जाना जाएगा। एक भाजपा नेता ने कहा कि ये बदलाव भले ही प्रतीकात्मक लगें, लेकिन गहराई से जांच करने पर एक बड़ा वैचारिक बदलाव नजर आता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय लोकतंत्र अब सत्ता से ज्यादा जिम्मेदारी और पद से ज्यादा सेवा को महत्व देता है। उन्होंने कहा कि नाम बदलने का मतलब मानसिकता में बदलाव भी है, क्योंकि संस्थाएं बोलती हैं।






































