हर साल पहली बारिश के साथ नई सड़कों, पुलों और एक्सप्रेसवे को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आती हैं। इसके बाद करोड़ों रुपये की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निर्माण, गुणवत्ता और निगरानी को लेकर सवाल लगातार उठने लगते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार इसे रोकने के लिए क्या कदम उठा रही है और विशेषज्ञ इस पर क्या कहते हैं। आइए जानते हैं।
बारिश का मौसम आते ही कुछ खबरें हमें हर साल पढ़ने को मिलती हैं। जैसे छत्तीसगढ़ में लगातार बारिश से जनजीवन ठप पड़ा, भिलाई में कुछ देर की बारिश से बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों सोसाइटियों और सड़कों पर पानी भरा। इसी तरह बीते कुछ वक्त एक खबर और सुनाई देती है। पहली बारिश नहीं झेल सका फला एक्सप्रेस वे या बारिश में बहा निर्माणाधीन पुल। कुछ ऐसी ही खबरें इस बारिश में भी सुनाई दीं।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इसकी वजह सिर्फ बारिश की वजह से हजारों करोड़ में बने एक्सप्रेस वे धंस जाते हैं या कोई और भी वजह है? बीते वर्षों में इस तरह के कितने मामले सामने आए हैं? सरकार इस तरह के मामलों पर क्या एक्शन लेती है? विशेषज्ञ इसके लिए किसे जिम्मेदार मानते हैं? आइये जानते हैं…
मामला क्या है?
राजनांदगांव में पहली ही बारिश के बाद लगभग 22-50 करोड़ रुपये की लागत से बने बरगा और आलीवारा रेलवे ओवरब्रिज की नई सड़कें और एप्रोच रोड धंस गई हैं। हाल ही में लोकार्पित हुए इन पुलों में 70 फीट तक लंबी दरारें आ गई हैं और सड़क कई जगह टूटकर दो हिस्सों में बंट गई है।
क्या ऐसे मामले पहली बार आ रहे हैं?
इसी साल फरवरी में सरकार से पूछा गया था कि बारिश की वजह से कितने नए बने एक्सप्रेसवे, सड़के और ब्रिजों को नुकसान हुआ। ऐसा होने पर सबंधित कॉन्ट्रैक्टर या एजेंसी के खिलाफ क्या कोई कार्रवाई की गई। इसके जवाब में सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय ने बताया था कि वर्ष 2025-26 के दौरान देशभर में 51 नए बने राष्ट्रीय राजमार्ग और एक्सप्रेसवे परियोजनाओं में बारिश के कारण नुकसान दर्ज किया गया।
इसकी वजह क्या होती है?
टोल प्लानिंग एक्सपर्ट और सामाजिक कार्यकर्ता संजय शिरोडकर कहते हैं कि किसी भी सड़क, एक्सप्रेसवे या पुल के निर्माण से पहले विस्तृत प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसमें जरूरत का आकलन, डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट), बजट स्वीकृति, जमीन अधिग्रहण, पर्यावरण मंजूरी, टेंडर प्रक्रिया, निर्माण और गुणवत्ता जांच जैसे कई चरण शामिल होते हैं। इसलिए यदि किसी परियोजना में शुरुआती बारिश में ही सड़क धंसने, भूस्खलन या अन्य तरह की क्षति होती है, तो केवल भारी बारिश को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उनके मुताबिक कई बार इसकी वजह निर्माण की गुणवत्ता में कमी, जल निकासी (ड्रेनेज) की कमजोर व्यवस्था, ढलानों की पर्याप्त सुरक्षा न होना या परियोजना के दौरान तय मानकों का पूरी तरह पालन न होना भी हो सकता है।
इसे कैसे रोका जा सकता है?
शिरोडकर के अनुसार ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए निर्माण की गुणवत्ता से किसी भी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए। जिन इलाकों में भारी बारिश, भूस्खलन या पर्यावरणीय जोखिम पहले से मौजूद हैं, वहां परियोजना की योजना उसी हिसाब से बनाई जानी चाहिए। इसके अलावा भारतीय मौसम विभाग के साथ लगातार समन्वय रखकर मौसम की अग्रिम चेतावनियों का उपयोग किया जा सकता है, ताकि जरूरत पड़ने पर समय रहते सुरक्षा उपाय किए जा सकें। उनका कहना है कि नियमित गुणवत्ता जांच, बेहतर ड्रेनेज व्यवस्था और निर्माण के बाद समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट भी ऐसी घटनाओं की आशंका को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
सरकार का इस तरह के मामलों पर क्या कहना है?
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, बारिश के दौरान सड़कों और पुलों को होने वाले नुकसान के पीछे एक ही कारण जिम्मेदार नहीं होता। अलग-अलग परियोजनाओं में अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन, बाढ़, नदी के तेज बहाव, सड़क में पानी भरने और मिट्टी के कटाव जैसी वजहें सामने आई हैं। कुछ मामलों में प्रारंभिक जांच में निर्माण संबंधी खामियां, डिजाइन की कमी या अधूरे निर्माण कार्य की भी पहचान हुई है। जहां भी ऐसी कमियां पाई गईं, वहां संबंधित एजेंसियों से जवाब मांगा गया और सुधारात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए गए।
इस तरह के मामलों से निपटने के लिए क्या सरकार ने कोई कदम उठाए हैं?
मंत्रालय का कहना है कि राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) के गुणवत्ता मानकों के अनुसार किया जाता है।
निर्माण कार्य की निगरानी के लिए प्राधिकरण इंजीनियर और स्वतंत्र इंजीनियर नियुक्त किए जाते हैं।
इसके अलावा गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए मोबाइल आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम, नेटवर्क सर्वे व्हीकल (NSV), ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी, मोबाइल क्वालिटी कंट्रोल वैन और थर्ड-पार्टी क्वालिटी ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई हैं।
सरकार का कहना है कि परियोजना की डीपीआर तैयार करते समय बारिश, बाढ़, भू-भाग और मिट्टी की प्रकृति का भी आकलन किया जाता है, ताकि बेहतर ड्रेनेज और सुरक्षित डिजाइन तैयार किए जा सकें।
वहीं जिन परियोजनाओं में निर्माण संबंधी खामियां मिलीं, वहां ठेकेदारों के खिलाफ शो-कॉज नोटिस, जुर्माना, रिस्क एंड कॉस्ट नोटिस और कुछ मामलों में डिबार जैसी कार्रवाई भी की गई है।
उदाहरण के तौर पर, केरल के NH-66 पर रिटेनिंग वॉल गिरने के मामले में ठेकेदार और स्वतंत्र इंजीनियरिंग फर्म को जांच पूरी होने तक भविष्य की निविदाओं में भाग लेने से अस्थायी रूप से रोक दिया गया।
राजस्थान में अमृतसर-जामनगर इकोनॉमिक कॉरिडोर की सड़क की गुणवत्ता में कमी मिलने पर ठेकेदार पर 50 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया और निगरानी में लापरवाही बरतने वाले अथॉरिटी इंजीनियर टीम के दो अधिकारियों को हटा दिया गया।
इसके अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों की कई परियोजनाओं में भी ठेकेदारों को शो-कॉज नोटिस जारी किए गए और स्वतंत्र गुणवत्ता जांच के आदेश दिए गए।









