छत्तीसगढ़

भिलाई-दुर्ग में भू-माफियाओं और अवैध प्लाटिंग का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। सरकारी जमीन, नाले, चारागाह, कोटवारी भूमि और निजी खाली भूखंडों पर कब्जा कर उन्हें वैध बताकर भोले-भाले लोगों को प्लॉट बेचने का कारोबार खुलेआम चल रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस पूरे खेल में राजनीतिक संरक्षण और रसूख का इस्तेमाल होने के आरोप भी लगातार सामने आ रहे हैं। नतीजा यह है कि अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर जमीन खरीदने वाले लोग बाद में नगर निगम, तहसील कार्यालय और कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने को मजबूर हो जाते हैं।

भिलाई, दुर्ग, जेवरा-सिरसा, कोहका, कोसानाला, कुरूद, हाउसिंग बोर्ड क्षेत्र, कैलाश नगर, शांतिनगर, जामुल, रिसाली और डंडेरा सहित कई इलाकों में वर्षों से अवैध प्लाटिंग का खेल जारी है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकारी और निजी खाली जमीनों पर पहले कब्जा किया जाता है, फिर सड़क और बाउंड्रीवाल बनाकर उसे वैध कॉलोनी का स्वरूप दिया जाता है। इसके बाद आकर्षक ब्रोशर और बड़े-बड़े दावों के साथ लोगों को प्लॉट बेच दिए जाते हैं।

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नगर निगम समय-समय पर बुलडोजर कार्रवाई कर अवैध कब्जे हटाता है, सड़कें काटता है और पुलिस थानों में एफआईआर के लिए शिकायत भी भेजता है, लेकिन कुछ दिनों बाद वही लोग फिर उसी जमीन पर सक्रिय दिखाई देते हैं। इससे साफ है कि कार्रवाई का डर अवैध प्लाटिंग करने वालों में नहीं है। स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगते रहे हैं कि कई मामलों में राजनीतिक दलों से जुड़े प्रभावशाली लोगों और उनके रिश्तेदारों का संरक्षण मिलने से कार्रवाई प्रभावित होती है।

मुकेश
Sarada

सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों को उठाना पड़ता है, जो अपने परिवार के लिए छोटा सा आशियाना खरीदने का सपना लेकर जमीन खरीदते हैं। बाद में जब पता चलता है कि जमीन सरकारी है, चारागाह भूमि है या मास्टर प्लान के विपरीत है, तब उनके सामने कानूनी संकट खड़ा हो जाता है। कई कॉलोनियों के निवासी आज भी मंत्री, कलेक्टर और प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन वर्षों बाद भी उनके मामलों का निराकरण नहीं हो पाया है।

खाटू श्याम
Rungta

रेरा भी सवालों के घेरे में

छत्तीसगढ़ में घर और प्लॉट खरीदने वालों के हितों की रक्षा के लिए रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) का गठन किया गया था। इसका उद्देश्य बिल्डरों की मनमानी पर रोक लगाना और पारदर्शिता सुनिश्चित करना था। लेकिन प्रदेश में कई बिल्डर रेरा के नियमों को खुली चुनौती देते दिखाई दे रहे हैं।

अलताब
शमशेर

रेरा में हजारों शिकायतें लंबित होने की बात सामने आती रही है। कई मामलों में बिल्डरों को जुर्माना भी लगाया गया, लेकिन अवैध प्लाटिंग और अनियमित परियोजनाओं पर पूरी तरह रोक नहीं लग सकी। इतना ही नहीं, रेरा के एक तथाकथित अधिकारी-कर्मचारी पर बिल्डरों के लिए काम करने के आरोप भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन ऐसे आरोपों ने रेरा की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सरकारी जमीन को बना रहे प्रोजेक्ट का हिस्सा

भूमि कारोबार से जुड़े जानकारों के अनुसार, कुछ बड़े बिल्डर सरकारी जमीन, घास भूमि और नाले की भूमि को अपने प्रोजेक्ट का हिस्सा बनाकर उसका व्यावसायिक उपयोग करने से भी नहीं चूक रहे हैं। पहले कब्जा किया जाता है, फिर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर प्रभाव का इस्तेमाल कर जमीन को अपने पक्ष में करवाने की कोशिश की जाती है। इसके बाद बहुमंजिला इमारतें और कॉलोनियां विकसित कर ऊंचे दामों पर बेची जाती हैं।

 रसूख के दम पर चलता है खेल

स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ भू-माफिया और बिल्डर सत्ता पक्ष से संबंध होने का दावा कर खुलेआम प्लॉट बेचते हैं। कई बार शिकायतकर्ताओं को ही कोर्ट जाने की सलाह देकर प्रशासनिक कार्रवाई से हाथ खींच लिए जाते हैं। छोटे मामलों में कार्रवाई हो जाती है, लेकिन जहां बड़े नाम सामने आते हैं, वहां जांच लंबी खिंचती चली जाती है।

 विवादित बना दी जाती है जमीन

भू-माफियाओं का एक तरीका यह भी बताया जाता है कि वे खाली और महंगी जमीनों को जानबूझकर विवादों में घसीट देते हैं। जमीन मालिक लगातार विवाद से परेशान होकर बाजार मूल्य से कम कीमत पर जमीन बेचने को मजबूर हो जाता है। इसके बाद वही जमीन करोड़ों के प्रोजेक्ट में बदल जाती है। पुलिस के पास ऐसे कई मामलों की शिकायतें पहुंचती हैं, लेकिन कार्रवाई में वर्षों लग जाते हैं।

 आउटर इलाकों पर सबसे ज्यादा नजर

भिलाई-दुर्ग के आउटर क्षेत्रों में कृषि भूमि और मास्टर प्लान के तहत ग्रीन जोन की जमीनें अवैध प्लाटिंग करने वालों के निशाने पर हैं। कुछ समय पहले सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे और प्लाटिंग के मामले सामने आने के बाद प्रशासन ने कई जगहों पर कार्रवाई कर जमीन को वापस ग्रीनलैंड के रूप में विकसित किया था। निगम प्रशासन का कहना है कि मास्टर प्लान के विपरीत विकसित की गई अवैध कॉलोनियों पर लगातार कार्रवाई की जा रही है।

 आम जनता के लिए चेतावनी

जमीन या प्लॉट खरीदने से पहले खरीदारों को संबंधित भूमि के राजस्व रिकॉर्ड, मास्टर प्लान की स्थिति, रजिस्ट्री दस्तावेज, स्वीकृत ले-आउट और आवश्यक अनुमतियों की जांच अवश्य करनी चाहिए। केवल ब्रोशर, राजनीतिक पहुंच या मौखिक आश्वासन के आधार पर निवेश करना भविष्य में बड़ी कानूनी और आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है।

भिलाई-दुर्ग में अवैध प्लाटिंग का यह खेल केवल सरकारी जमीन की लूट नहीं है, बल्कि हजारों परिवारों के अपने घर के सपने से जुड़ा एक गंभीर मामला है। यदि समय रहते प्रभावी और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में ऐसे विवाद और अधिक गहराते जाएंगे तथा इसकी सबसे बड़ी कीमत आम नागरिक को ही चुकानी पड़ेगी।