पुलिस वालों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा! आखिर संसद मार्च में उतरे थे छात्र, उपद्रवी या सियासी मोहरे?
नई दिल्ली। लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन जनता का अधिकार है, लेकिन क्या विरोध के नाम पर पुलिस जवानों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटना भी लोकतंत्र का हिस्सा है? राजधानी दिल्ली में संसद मार्च के दौरान सामने आए वीडियो ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। वायरल फुटेज में कुछ प्रदर्शनकारी पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट करते दिखाई दे रहे हैं। इसके बाद देशभर में एक ही सवाल गूंज रहा है—आखिर पुलिस जवानों पर हमला करने वाले लोग कौन हैं?
21 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर निकाले गए प्रदर्शन के दौरान हालात अचानक हिंसक हो गए। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प शुरू हुई, बैरिकेड्स तोड़े गए और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में जुटे पुलिस जवानों पर हमला किया गया। दिल्ली पुलिस के मुताबिक, इस हिंसा में 118 से अधिक पुलिस और सुरक्षा बल के जवान घायल हुए हैं। कई जवानों को अस्पताल में उपचार कराना पड़ा।
घटना के बाद सामने आए वीडियो में कुछ लोग पुलिसकर्मियों को दौड़ाते, धक्का-मुक्की करते और हमला करते दिखाई दे रहे हैं। इन दृश्यों ने आंदोलन की मंशा और उसमें शामिल लोगों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह वास्तव में छात्रों का शांतिपूर्ण आंदोलन था या फिर कुछ उपद्रवी तत्वों ने इसे हिंसा में बदल दिया?
दिल्ली पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल वीडियो और अन्य डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर हमलावरों की पहचान की जा रही है। पुलिस का कहना है कि कानून अपने हाथ में लेने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।
इस आंदोलन की शुरुआत शिक्षा व्यवस्था और विभिन्न मांगों को लेकर हुई थी, लेकिन हिंसा के बाद इसका राजनीतिक स्वरूप भी चर्चा में आ गया है। विपक्षी दलों ने प्रदर्शनकारियों की मांगों का समर्थन किया है, जबकि भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया है कि आंदोलन को राजनीतिक संरक्षण देकर अराजकता फैलाने की कोशिश की जा रही है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि पुलिसकर्मियों पर हमला करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं होती, तो भविष्य में किसी भी आंदोलन के नाम पर हिंसा को बढ़ावा मिल सकता है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन हिंसा का नहीं। वर्दी पर हमला केवल एक पुलिसकर्मी पर हमला नहीं, बल्कि कानून के शासन को चुनौती भी माना जाता है।
अब देश की निगाहें दिल्ली पुलिस की जांच पर टिकी हैं। क्या पुलिस जवानों को पीटने वाले चेहरों का सच सामने आएगा? क्या हिंसा के जिम्मेदार लोगों की पहचान होगी? और क्या आंदोलन के नाम पर कानून तोड़ने वालों को सजा मिलेगी? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में जांच के साथ सामने आएंगे।
सवाल वही है—विरोध का अधिकार किसे है और हिंसा का अधिकार आखिर किसने दिया?








