छत्तीसगढ़

भिलाई में कॉलोनाइजरों की धोखाधड़ी पर विधायक रिकेश के सवाल पर वित्त मंत्री का बड़ा खुलासा

भिलाई नगर, 16 जुलाई। छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन ने भिलाई नगर निगम क्षेत्र में निजी कॉलोनाइजरों द्वारा आम जनता से की जा रही धोखाधड़ी का मामला उठाया। विधायक सेन ने सदन में प्रश्नकाल के दौरान सरकार से पूछा कि भिलाई में कई कॉलोनाइजरों ने प्रोजेक्ट पूरा किए बिना ही लोगों से पूरी रकम वसूल ली है, लेकिन न तो उन्हें मकानों का पजेशन (आधिपत्य) दिया जा रहा है और न ही पैसे वापस किए जा रहे हैं।

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विधायक रिकेश सेन ने डिफॉल्टर कॉलोनाइजरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने, उनकी संपत्तियों को कुर्क करने और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए सरकार की कार्ययोजना पर तीखे सवाल दागे।

मुकेश
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वित्त मंत्री ओपी चौधरी का जवाब : रेरा में दर्ज हुए 14 मामले

खाटू श्याम
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इस मुद्दे पर विभागीय जवाब देते हुए सूबे के वित्त मंत्री ओ पी चौधरी ने सदन को बताया कि विगत तीन वर्षों में छत्तीसगढ़ भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण कार्यालय में दुर्ग जिला अंतर्गत मकान का आधिपत्य सौंपे जाने के संबंध में कुल 14 प्रकरण प्राप्त हुए हैं। प्राप्त प्रकरणों में से 13 मामलों में रेरा प्राधिकरण द्वारा अंतिम आदेश जारी किया जा चुका है। केवल एक मामला प्राधिकरण के समक्ष सुनवाई और निर्णय के लिए प्रक्रियाधीन है।


उन्होंने बताया कि रेरा के नियमों के अनुसार स्थानीय निकायवार पृथक से प्रकरण दर्ज नहीं किए जाते हैं। हितग्राहियों के हितों की रक्षा के लिए भू-संपदा (विनियमन और विकास) अधिनियम 2016 की धारा 11, 17, 18 एवं 31 में कड़े उपबंध मौजूद हैं। पीड़ित हितग्राही धारा-31 के तहत रेरा प्राधिकरण के समक्ष अपनी शिकायत या परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

अलताब
शमशेर


पीड़ितों को पैसा वापस दिलाने या मकान का पजेशन दिलाने के लिए रेरा द्वारा अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत सुनवाई कर गुणदोष के आधार पर अर्धन्यायिक प्रक्रिया के तहत आदेश पारित किया जाता है।


विधायक रिकेश सेन द्वारा दोषी कॉलोनाइजरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर संपत्ति कुर्क करने के सवाल पर वित्त मंत्री ने कानूनी स्थिति साफ की। उन्होंने बताया कि रेरा अधिनियम, 2016 के तहत प्राधिकरण को सीधे एफआईआर दर्ज कराने का उपबंध नहीं है। मंत्री ने बताया कि अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर धारा-60, 61 एवं 63 के तहत सुनवाई के बाद जुर्माना (शास्ति) लगाने का क्षेत्राधिकार रेरा को है। इसके अलावा, प्राधिकरण द्वारा पारित आदेशों के उल्लंघन की स्थिति में क्रियान्वयन अधिकारी को सिविल कोर्ट की डिक्री की भांति कार्रवाई करने का विधिक अधिकार प्राप्त है। यह एक सतत प्रक्रिया है, इसलिए इसके लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की जा सकती।