बहुमत नहीं, कानून चलेगा! भिलाई निगम में कमिश्नर हटाने की पार्षदों की कोशिश पर हाईकोर्ट का बड़ा झटका
भिलाई।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भिलाई नगर निगम में कमिश्नर को हटाने के प्रस्ताव से जुड़े बहुचर्चित मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र में केवल बहुमत पर्याप्त नहीं होता, बल्कि हर निर्णय कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए। अदालत ने 32 पार्षदों की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें नगर निगम आयुक्त राजीव पांडेय को हटाने के प्रस्ताव को लागू कराने की मांग की गई थी।
यह विवाद लंबे समय से नगर निगम के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और आयुक्त के बीच प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकारों को लेकर चल रहा था। पार्षदों का आरोप था कि आयुक्त मेयर-इन-काउंसिल और सामान्य सभा की मंजूरी के बिना कई वित्तीय निर्णय ले रहे हैं तथा परिषद द्वारा पारित प्रस्तावों का पालन नहीं किया जा रहा है। इसी नाराजगी के बीच 25 मार्च 2026 को आयोजित विशेष बजट बैठक में पार्षदों ने अचानक नगर निगम अधिनियम, 1956 की धारा 54(2) का हवाला देते हुए आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव पेश कर दिया। पार्षदों का दावा था कि प्रस्ताव को तीन-चौथाई बहुमत से पारित किया गया और इसके बाद राज्य सरकार तथा जिला प्रशासन को कार्रवाई के लिए पत्र भी भेजा गया।
सरकार की ओर से कोई कार्रवाई नहीं होने पर 32 पार्षद हाईकोर्ट पहुंचे। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि संविधान ने स्थानीय निकायों को स्वायत्तता प्रदान की है और जब निर्वाचित प्रतिनिधियों का भारी बहुमत किसी अधिकारी पर अविश्वास जताता है, तब सरकार को उस अधिकारी को हटाने की कार्रवाई करनी चाहिए। उनका तर्क था कि जनप्रतिनिधियों की सामूहिक इच्छा की अनदेखी लोकतांत्रिक भावना के विपरीत है।
वहीं राज्य सरकार की ओर से उप-महाधिवक्ता ने अदालत में कहा कि जिस विशेष बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया गया, वह केवल बजट पर विचार-विमर्श के लिए बुलाई गई थी। नियमों के अनुसार विशेष बैठक में केवल वही विषय लिया जा सकता है, जिसका उल्लेख पूर्व निर्धारित एजेंडा में हो। चूंकि कमिश्नर को हटाने का प्रस्ताव एजेंडा में शामिल नहीं था, इसलिए पूरी प्रक्रिया कानून और नियमों के विपरीत थी।
मामले की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने 52 पृष्ठों का विस्तृत निर्णय सुनाया। अदालत ने कहा कि विशेष बैठक के दौरान एजेंडा से हटकर इतना महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित करना नगर निगम अधिनियम और निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना पूर्व सूचना और निर्धारित प्रक्रिया के पारित किया गया कोई भी प्रस्ताव कानूनी रूप से वैध नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र केवल बहुमत के आधार पर नहीं चलता, बल्कि **'रूल ऑफ लॉ' (कानून का शासन)** उसकी सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला है। यदि प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है तो बहुमत से पारित निर्णय भी न्यायिक जांच में टिक नहीं सकता। इसी आधार पर अदालत ने पार्षदों की याचिका खारिज करते हुए राज्य सरकार को आयुक्त को हटाने का कोई निर्देश देने से इनकार कर दिया।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि आयुक्त के खिलाफ लगाए गए आरोप सही या गलत हैं। न्यायालय ने कहा कि उसने आरोपों के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है। यदि भविष्य में जनप्रतिनिधि या सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार निर्धारित प्रक्रिया अपनाकर कार्रवाई करते हैं, तो वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं।
हाईकोर्ट के इस फैसले को स्थानीय स्वशासन व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण कानूनी नजीर माना जा रहा है। निर्णय ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में बहुमत की शक्ति महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन वह कानून और निर्धारित प्रक्रिया से ऊपर नहीं हो सकती। नियमों का पालन किए बिना लिया गया कोई भी निर्णय, चाहे उसे कितना ही व्यापक समर्थन क्यों न प्राप्त हो, न्यायिक कसौटी पर टिक नहीं सकता।











